गुलज़ार साब “गोल माल” के गीत “आनेवाला पल” के लिए फ़िल्मफ़ेअर जीतने के बाद।

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“हर कोई पुरस्कृत होना पसंद करता है और जब फिल्मफेयर जैसा लोकप्रिय एवं जनस्वीकृत पुरस्कार मिले तो खुशी स्वाभाविक है। (आनेवाला पल) धुन पर (लिखा था)। पंचम ने धुन गुनगुनायी। सुनकर लगा कि यह धुन अधिक शब्दों का बोझ नहीं उठा पायेगी, इसलिए कम से कम शब्दों के साथ सिचुएशन के हिसाब से मैंने धुन में भाव पिरो दिये।

शायरी अपनी जगह है और गीत लेखन अपनी जगह। मगर ईमानदारी दोनों में ज़रूरी है। बेईमानी से गीत नहीं लिखा जा सकता। फिल्मी गीत लिखते समय फ़िल्म को, उसके पात्र को तरजीह देनी पड़ती है।

गीत मे भाव का स्वतःस्फूर्त होना बहुत ज़रूरी है। ऐसा कहीं नहीं लगे कि जबरन प्रयास करके लिखा गया है। गीत के बोल पात्र की मनःस्थितियों के अनुकूल होने चाहिएं। एक अच्छे गीत की पहचान यह है कि उसमें बेसाख्तगी और नगमा हो। जैसे, ‘यूं तो हमने लाख हसीं देखे हैं, तुमसा नहीं देखा’। इस गीत में सादगी भी है, बेसाख्तगी भी और नगमा भी। गीत को कविता की कसौटी पर परखना ज्यादती है।

शैलेन्द्र ने मुझे हमेशा प्रभावित किया। उनके गीतों में नग्मा और कविता का सही अर्थ दिखाई पड़ता है। उनके पहले यह बात डी. एन. मधोक में थी और आज मजरूह सुल्तानपुरी में है। मैं अपने गीतों में शैलेन्द्र की खूबियों को, सादगी को, बेसाख्तगी को ढालने की कोशिश करता हूं। मैं स्वयं निर्देशक हूं तथा स्क्रिप्ट भी लिखता हूं इसलिए पात्र की ओर से महसूस करने में, उसकी मनःस्थिति को जीकर गीत लिखने में आसानी होती है।

मैं हमेशा कोशिश करता हूं कि खुद को नहीं दोहराऊं। मेरी शायरी में चांद और रात बार बार आये हैं मगर चांद को मैंने अठन्नी से लेकर कटोरे तक की उपमा दी है। वैसे देखिए तो फिल्मी गीतों में चालीस-पैंतालीस ही शब्द ऐसे हैं जो घूम फिरकर कहीं न कहीं से आ ही जाते हैं. ‘दिल’ तो खलौने की तरह इतना घिस गया है कि अब इसका कोई असर नहीं होता।

पंचम की ध्वनि की पकड़ कमाल की है। हिन्दी न जानते हुए भी वह गीत में ध्वनि की अहमियत को बखूबी समझता है। ‘खुश्बू’ के गीत ‘ओ मांझी रे’ में उसने सोडा वाटर की बोतल में पानी भरकर फूंक से अजीब आवाजें निकालकर स्वाभाविक ध्वनी प्रभाव उत्पन्न किया। ‘किनारा’ में ‘एक ही ख्वाब कई बार’ नज्म का नज्म, दृश्य का दृश्य और गीत का गीत है। यहां तक कि हंसी और खांसी की ध्वनी भी गीत का हिस्सा बन गयी है।

फ़िल्म ‘मेरे अपने’ का ‘रोज अकेली आये’ (मुझे सबसे ज़्यादा पसंद है)। ‘क्यों’, यह बता पाना मुश्किल है। मुझे मोगरा का फूल पसंद है मगर क्यों पसंद है, कह नहीं सकता। पसंद है, तो है!

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